English Version  
   
   Visitor Counter
CGMFPFED.ORG

वन संसाधन प्रबंधन -


राज्य के वनो को कार्य योजनाओं के माध्यम से वैज्ञानिक रूप से प्रबंधित किया जाता है। राज्य सरकार ने लघु वनोपज के महत्व को ध्यान में रखते हुये लघु वनोपज के संरक्षण, उचित उपयोग, प्रसंस्करण और विपणन की गतिविधियों पर ध्यान केन्द्रित करने के लिये छत्तीसगढ़ राज्य को "हर्बल राज्य" घोषित किया है। तदानुसार छत्तीसगढ़ लघु वनोपज संघ आवश्यक कदम उठा रहा है।


पारिस्थितिक तंत्र का संरक्षण- लोक संरक्षित क्षेत्र के माध्यम से लघु वनोपज में समृद्ध

लोक संरक्षित क्षेत्र लघु वनोपज में समृद्ध है जो पारिस्थितिक तंत्र प्रबंधन की अवधारणा के साथ संरक्षित व प्रबंधित है, व कुल जैव विविधता और बायोमॉस में वृद्धि को लक्षित करता है जो कि लोक संरक्षण और गहन प्रबंधन गतिविधियों के संबंधित वन विभागों के लोगों द्वारा संरक्षित क्षेत्र में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के साथ किया जाता है। प्रत्येक पीपीए के तहत 200 से 500 हेक्टेयर न्युनतम क्षेत्र है। जिसके अंतर्गत अवैध कटाई, अतिक्रमण, आग और चराई आदि के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा के साथ जंगल में आंतरिक संरक्षण किया जाता है। पीपीए के तहत आने वाले कुल क्षेत्र 2 लाख हेक्टेयर से अधिक है व 1 लाख से अधिकत हेक्टेयर के साथ अब तक गहन प्रबंधन के तहत हर साल लगभग 20 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त वन क्षेत्र आता है। पीपीए कार्यक्रम के तहत विभिन्न घटक निम्नानुसार है-


लघु वनोपज संसाधन सूची व मूल्यांकन

संसाधन सूची का मुख्य उद्देश्य प्रजातियों की पहचान घनत्व वन क्षेत्रों में होने वाली लकड़ी और गैर लकड़ी दोनो प्रजातियों के उपज की पहचान कराना है। यह जानकारी संरक्षक और स्थायी कटाई के लिये लक्षित प्रजातियों की पहचान करने में योजनाकारों को सक्षम बनाता है। इसके अलावा सुरक्षित उपज का प्रबंधन करने में सक्षम बनाता है ताकि भविष्य की कार्यवाही के निर्णय तय किया जा सके।


संसाधन सूची में जंगल के सभी 3 क्षेत्रों को शामिल किया गया है, शीर्ष क्षेत्र, मध्य क्षेत्र और जमीनी वनस्पति। सूची की प्रक्रिया नीचे संक्षेप में वर्णित है-


  1. संसाधन सूची हर वर्ष सितम्बर - अक्टूबर महीने में तैयार की जाता है ताकि सभी तीनों क्षेत्रों, विशेष रूप से जमीनी वनस्पतियों के बारे में अधिकतम जानकारी एकत्रित की जा सके।
  2. पीपीए क्षेत्र में संसाधन (1000 हेक्टेयर जंगल) का निर्धारण 0.1 हेक्टेयर के व्यवस्थिति नमूना भूखंडों पर किया जाता है। 450 मी. ग 450 मी. आकार के पेड़ों, झाड़ियों, जड़ी बूटियों और बेलाओं की जानकारी एकत्रित करना।
  3. 0.1 हेक्टेयर प्लॉट में वृक्ष प्रजातियों के उत्थान स्थिति पर जानकारी एकत्र करने के लिए 2 मी. ग 2 मी. के 5 वर्ग रखे गये हैं।
  4. औषधीय पौधों सहित जड़ी बूटियों, झाड़ियों और बेलाओं पर जानकारी एकत्र करने के लिए 0.1 हेक्टेयर के प्लाट में 5 मी. ग 5 मी. के 4 वर्ग रखे गये हैं।
  5. संपूर्ण जानकारी को व्यवस्थित रूप से मानक प्रारूपों में दर्ज किया गया है। इस प्रायोजन के लिये विकसित किये गये साफ्टवेयर में संकलित जानकारी का कम्प्यूटरीकरण और विश्लेषण किया गया है।
  6. पौधों के उपयोगी भागों के हरे और सूखे वजन का आंकलन करने के लिए पौधों के उपयोगी भागों के नमूनों को एकत्र किया जाता है।
  7. इन सूचनाओं का विश्लेषण क्षेत्र से अलग-अलग वनोपज प्रदान करता है।

संसाधन सूची और मूल्यांकन के मुख्य उत्पादों को संक्षेपित किया जा सकता है-


  1. अलग-अलग क्षेत्रों में प्रजातियों की सूची लगाना।
  2. विभिन्न पेड़ों प्रजातियों के पुर्नउत्थान की स्थिति।
  3. वृक्षों, झाड़ियों और जड़ी बूटियों से पेड़ों और लघु वनोपज से कुल बढ़ते हुये स्टॉक।
  4. वृक्षों, झाड़ियों और बेलाओं सहित जड़ी बूटियों से लघु वनोपज का होने वाला कुल पैदावार।
  5. प्रजातियों के वितरण और उनके पुर्नउत्थान की स्थिति पर विषयगत मानचित्र।
  6. प्रबंधन प्रथाओं का प्रभाव।

स्वस्थानीय संरक्षण -


यह गहन प्रबंधन के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र है। यह क्षेत्र मुख्य संचालन जैव विविधता को समृद्ध करने एवं प्रजातियों के बायोमास को बढ़ाने के लिए खतरे एवं संवेदनशील प्रजातियों और मिट्टी की नमी संरक्षण उपायों के विकास को बढ़ावा देने के लिये सांस्कृतिक संचालन है। यह क्षेत्र स्थानीय लोगों के वन संरक्षण समितियों की सक्रिय भागीदारी के साथ पूरे क्षेत्र को सीमांकन आग और चारागाह आदि से सुरक्षा दिलाता है।


विनाश विहीन विदोहन -


इसके अंतर्गत ग्रामीण समुदायों / वन समितियों को शामिल किया गया है और इन्हें जंगल के उत्पादन में सुधार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार के लिए और जंगल के स्वास्थ्य को बनाये रखने के लिए टिकाउ आधार पर विनाश विहीन विदोहन पद्धति को अपनाया जा सके। विनाश विहीन विदोहन पद्धति को बनाये रखने के लिए सामाजिक रीति रिवाजों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए राज्य के कुछ हिस्सों में आंवला का संग्रहण आंवला नवमी के बाद आंवला फल के परिपक्व होने के बाद शुरू होता है।


प्रसंस्करण -


स्थानीय समुदायों को मूल्य वृद्धि के लिए मूल स्त्रोत के पास वन उपज के प्राथमिक प्रसंस्करण में प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि बेहतर मूल्य प्राप्त हो सके। इस प्रयोजन के लिए सभी पीपीए में सुखाने के लिए शेड / प्लेटफार्म का निर्माण किया गया है। प्रसंस्करण के लिए उपकरण जैसे कि पल्वेराईजर्स, तेल निष्कर्षण इकाइयां और शहद निस्पंदन इकाइयां स्थापित की जाती है। कुछ वन समितियों ने कुछ हर्बल उत्पादों जैसे त्रिफला पाउडर, तिखुर पाउडर, छना हुआ शहद व माहुल पत्ती प्लेट्स और कप उत्पादन करने का कौशल हासिल किया है। इस क्षेत्र में आगे के विकास के लिए विशेषज्ञों को शामिल करने का प्रयास किया जा रहा है।


वनौषधालय द्वारा हर्बल दवाओं का व्यवसाय करना -


वनौषधालय ज्ञान विस्तार और पारंपरिक हर्बल दवा पद्धति के स्वास्थ्य देखभाल केन्द्र है। आयुर्वेदिक औषधि पद्धति पर पारंपरिक ज्ञान वाले पारंपरिक वैद्य की पहचान की जाती है और उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। भविष्य के अनुसंधान और विकास के लिए इन विधियां और प्रथाओं का दस्तावेजीकरण किया जा रहा है।


क्षमता निर्माण


क्षमता निर्माण वन कर्मचारियों के साथ स्थानीय समुदायों की आत्म निर्भरता कार्यक्रम के महत्वपूर्ण घटक हैं, जिसमें विशेषज्ञों को शामिल करते हुये प्रशिक्षण, क्षेत्रीय यात्राओं और अन्य विस्तार गतिविधियों का आयोजन किया जाता है।