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लघु वनोपज (एमएफपी)

 

लघु वनोपज (एमएफपी) का अर्थात एैसे उपज हैं जो विभिन्न वन प्रजातियों से फल, बीज, पत्ते, छाल, जड़, फूल और घास आदि के रूप में पाये जाते हैं तथा जिसमें औषधीय जड़ी बूटियॉं/झाड़ियों के पूरे भाग सम्मिलित हैं। छत्तीसगढ़ के वन इन लघु वनोपज से बहुत समृद्ध हैं। राज्य में कई लघु वनोपज प्रजातियां वाणिज्यिक महत्व की हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित, रायपुर एक त्रि स्तरीय सहकारी संगठन है जिसके निर्माण का मुख्य उद्देश्य लघु वनोपज के संग्रहणकर्ताओं के हित में, सहकारिता के तर्ज पर लघु वनोपज के व्यापार और विकास में वृद्धि करना है। संघ के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं-

  1. निम्नलिखित विनिर्दिष्ट लघु वनोपज का संग्रहण और व्यापार
    1. तेन्दू पत्ता (Diospyrous melanoxylon roxburghii )
    2. कुल्लू (Sterculia urens), धावड़ा (Anogeissus latifolia), खैर (Acacia catechu) और बबूल (Acacia nilotica) के गोंद।
  2. तेन्दू पत्ता संग्रहणकर्ताओं के लिए कई सामाजिक-आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं का कार्यान्वयन जैसे मुफ्त चप्पल वितरण, उनके बच्चों की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति योजना, तेन्दू पत्ता संग्राहक सदस्यों के लिए बीमा योजनाएं, तेन्दू पत्ते के व्यापार से होने वाले लाभ का विभिन्न मजदूरी के रुप मे वितरण आदि।
  3. लघु वनोपज (एमएफपी) संग्रहणकर्ताओं को उनके संग्रहित उपज के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करना के लिए भारत सरकार ने Mechanism for Marketing of Minor Forest Produce (MFP) through Minimum Support Price (MSP) and Development of Value Chain for MFP" योजना की शुरुआत की है। इस योजना के तहत महत्वपूर्ण लघु वनोपज के लिए न्यून्तम समर्थन मूल्य तय की गई है। छत्तीसगढ़ में साल बीज (Shorea robusta), हर्रा (Terminalia bellerica), इमली (Tamarindus indica), चिरौंजी गुठली (Buchanania lanzan), लाख (कुसुमी, रंगीनी) (Karria lacca), और महुआ बीज (Madhuca latifolia) जैसे वनोपज की इस योजना के तहत क्रय किया जाना है।
  4. अन्य गैर विनिर्दिष्ट लघु वनोपज के संग्रहण और व्यापार को भी बाजार आश्वासन देते हुए जोड़ा गया है जैसे औषधीय और सुगंधित पौधे।
  5. लघु वन उपज आधारित प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा।
  6. लघु वन उपज के संरक्षण, विकास और सतत् उपयोग को बढावा ।
  7. औषधीय, सुगंधित और रंग देने वाले (डाई) पौधों सहित छोटे वनोपज की प्रजातियों की खेती को बढ़ावा।